मां बुद्धा देवी का प्राकट्य व लोमस ऋषि की तपोभूमि वाला रोमई गांव 50 सालों से वीरान
जालौन। संवाददाता पंकज शुक्ला विभिन्न धार्मिक आस्थाओं को समेटे हुए विकास खण्ड कुठौंद का रोमई गांव करीब 50 साल से वीरान है। 1970 के दशक में पड़ोसी गांवों में दस्युओं के आतंक ने रोमई गांव की करीब 4 हज़ार क...

जालौन। संवाददाता
पंकज शुक्ला
विभिन्न धार्मिक आस्थाओं को समेटे हुए विकास खण्ड कुठौंद का रोमई गांव करीब 50 साल से वीरान है। 1970 के दशक में पड़ोसी गांवों में दस्युओं के आतंक ने रोमई गांव की करीब 4 हज़ार की आबादी को पलायन को मजबूर कर दिया और इतना लंबा वक्त गुजरने के बाद भी ना तो नेताओं ने और ना ही प्रशासनिक अमले में इन ग्रामीण की अपने गांव में वापसी करने की पहल की।
सन् 1970 के दशक में दस्यु गिरोहों के द्वारा तांडव मचाने के बाद रोमई गांव धीरे धीरे वीराने की ओर बढ़ता ही गया। उस समय रोमई गांव की आबादी करीब चार से पांच हजार थी। तब यह गांव व्यापार का गढ़ माना जाता था, यहां से गन्ना, गुड़ और अनाज की बड़ी मात्रा में नाव के सहारे निर्यात किए जाते थे। कभी हजारों प्राकृतिक झटाओं को समेटे हुए, गुलजार करने वाला गांव आज वीरान हो चुका है। जहां कभी शिवालय पर शिव रात्रि के समय विशाल शिव कीर्तन का आयोजन किया जाता था और श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर विशाल दंगल का भी आयोजन होता था। वहां के आज सभी मंदिर खंडर होकर कटीली झाड़ियों के पिंड बन दुर्दशा की कहानी बयां कर रहे हैं। ग्रामीण गोविंद बताते हैं कि रोमई गांव के यमुना के दूसरे छोर पर बसे जनपद औरैया के बेहमई गांव में लगभग 42 वर्ष पूर्व सन 1981 में गांव के बीच चौराहे पर खड़ा कर बीस लोगों को गोली मार दी गई थी तो पूरे देश में इसकी गूंज भी हुई थी। जिसे आज बेहमई कांड के नाम से जानते हैं। इस घटना को उस समय की दस्यु सुंदरी फूलन देवी के गिरोह ने अंजाम दिया था। जिसके बाद औरैया के अस्ता गांव में 26 मई 1984 में हुए नरसंहार की गूंज से चंबल का बीहड़ थर्रा उठा। बेहमई कांड के बदले के लिए हुए इस नरसंहार को शायद ही चंबल का बीहड़ कभी भूले। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि बेहमई कांड के प्रतिशोध में यहां पर 12 मल्लाह जाति के जाति के लोगों को एक लाइन में खड़ा करके गोलियों से भून दिया गया था और गांव में आग लगा दी गई थी, जिसमें मां-बेटे की मौत हुई थी जिसे आज अस्ता कांड के नाम से लोग जानते हैं। जो बेहमई कांड के बदले की आग में हुआ था। इस गांव में फूलन देवी के सजातिय लोग रहते थे। इसलिए बदला लेने के लिए डकैत लालाराम, श्रीराम व कुसुमा नाइन ने अस्ता गांव में 12 लोग रामशंकर, बांकेलाल, महादेव, लक्ष्मी नारायण, लालाराम, छोटेलाल, भगवानदीन, धनीराम, रामेश्वर दयाल,भीकालाल, दर्शनलाल तथा शंभूदयाल को एक लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया और पूरे गांव में आग लगा दी। जिसमें मां शिवकुमारी व पांच वर्षीय बेटा मुनेश की जलकर मौत हो गई थी। आज भी यहां लोगों की आंखों में खूनी मंजर तैरता है। रोमई गांव के पड़ोस में हुए डबल नरसंहार से लोगों के पांव उखड़ गए और तेजी से पलायन शुरू हो गया। जिसके बाद वहां के बाशिंदों ने रोमई गांव के ऊपरी मुहल्ले देवनपूर्वा में कुछ लोगों ने घर बसाना शुरू किया। जिसे आज भी क्षेत्रीय बाशिंदे देवनपूर्वा नाम से पुकारते हैं जिसमें रोमई गांव के कुछ लोग घर मकान बनाकर आज भी निवास कर रहे हैं। किंतु गांव की एक बड़ी आबादी डर के कारण कूच कर गई थी।
कुछ इस तरह से बसा था रोमई
रोमई गांव निवासी गोविंद तिवारी बताते हैं कि उनकी जन्मभूमि रोमई है। बाल्यकाल भी इसी की रज में हुई। प्राचीन परम्पराओं को संजोए रोमई गांव धार्मिक मान्यताओं को भी समेटे स्थान लोमस ऋषि की तपोभूमि पर प्राचीन हनुमान मंदिर, मंशा देवी मंदिर, शिव मंदिर तथा गणपति बप्पा मंदिर है।यहां तक की मूर्तियां भी चोरी कर ली गई। जो आज खंडर हो गए हैं। जहां कभी शिवालय पर शिव रात्रि के समय विशाल शिव कीर्तन का आयोजन किया जाता था और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर विशाल दंगल का भी आयोजन होता था। वहां के आज सभी मंदिर खंडर होकर कटीली झाड़ियों के पिंड बन दुर्दशा की कहानी बयां कर रहे हैं।
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